Friday, May 29, 2015

चलो मैं लिखता हूँ...

तुम कहते हो - कुछ तुम लिखो,
क्यों कहते हो कि तुम लिखो

क्या लिखूँ इन पन्नों पर ,
जीवन का क्या गीत लिखूं,
इन कोरे-काले शब्दों में
मैं कैसा संगीत रचूँ ?

सोचा था आनंद हृदय का
तुममें सारा भर डालूँ ,
श्वेत- श्याम-से जीवन के
बचे रंग तुम्हें दे डालूँ

पर क्या करुँ- हृदय का विषाद
शब्दों में स्वतः उभर आता है
लिखने को बैठा श्वेत पक्ष मैं
स्याह स्वयं छलक जाता है

यही सोच चुप बैठा था कि
कब तक तुम्हें रुलाऊंगा,
अपने हृदय का बोझ भला
कब तक तुम्हें सहाऊंगा

फिर आज तुमने ही कहा-
कुछ तो लिखो, कुछ तो कहो,
दिनों तक मौन रहे तुम,
उन पलों की तुम आज कहो

जब तुम कहते हो- लिखो,
तो चलो, आज मैं लिखता हूँ,
मौन पड़े जो छंद हृदय में
आज उन्हें मैं कहता हूँ




Monday, June 25, 2012

तुम क्या थी


तुम क्या थी
बस
एक स्वप्न मधुर सा,
बस मेरी एक तृष्णा थी,
फिर भी मैं कुछ सोच चला था
भावों को मन में रोप चला था,
समय चला
अहसास बढ़े
कुछ दबे रहे
कुछ फूट चले,
तब उनमें से मैंने
थोड़े तुमसे भी कहे थे,
कुछ हाव-भाव में,
कुछ मन-ही-मन में,
कुछ होठों से भी निकले थे,
कुछ कविता के शब्दों में थे,
कुछ छिपे हुए उद्गारों में थे,
पर अच्छा है, कि
यह भी सोचूँ
कुछ बिना कहे ही रह गए
कुछ बिना सुने ही रह गए
जो कुछ तुम तक पहुँचे भी तो
उत्तर बिना ही रह गए,
वो भाव अधूरे रह गए,
कुछ स्वप्न अधूरे रह गए,
वह गीत अधूरा रह गया,
वह पूजा अधूरी रह गयी,
तुम जो मुझसे दूर हुए तो
वह कहानी,
कहानी ही रह गयी।

Sunday, August 28, 2011

"मैं पढूंगा तो तुम कैसे पढोगे?"

एक बार मैं राँची से नेतरहाट जाने वाली बस में बैठा हुआ था सवेरे का समय था ज्यादा भीड़-भाड़ भी नहीं थी लोगों का यात्रा में सबसे अच्छा साथी अख़बार होता है या फिर कोई पत्र-पत्रिका। मैं भी उसी एक साथी की तलाश की सोच में था, तभी एक लड़का,जिसकी उम्र मुश्किल से दस साल की रही होगी, अख़बार बेचने के लिए बस में चढ़ा बगल में बैठे एक व्यक्ति ने उससे यूँ ही मजाक में पूछा- "तुम पढ़ते-लिखते क्यों नहीं ? तुम्हारी उम्र तो स्कूल जाने की है तुम्हें पढ़ना चाहिए ना" वो लड़का शायद ऐसे सवालों का अभ्यस्त था उसने बिना वक्त लगाये तुंरत उत्तर दिया-"अगर मैं भी पढने-लिखने लगूँ , तो फिर तुमलोग ये सब कैसे पढ़ोगे"

यह उत्तर जिस शीघ्रता के साथ दिया गया, उससे मैं सोच में पड़ गया यह उत्तर उसकी उम्र के साथ मेल नहीं खा रहा था यह शायद पहले से सिखाया हुआ उत्तर हो सकता है लेकिन अगर यह उसका स्वयं का उत्तर था, तो फिर हमें उसकी तारीफ करनी होगी यह उसका ख़ुद का उत्तर नहीं हो सकता...और होना भी नहीं चाहिए...

कुछ ही समय बाद वह लड़का मुझे नीचे धुँए के छल्ले उडाता हुआ दिखा यह तो कोई मजबूरी नहीं थी लेकिन मैं यही देख रहा था। यह घटना अपने-आप में कई सवाल खड़े करती है....शायद अधिकांशतः अनसुलझे प्रश्न ही, जिनका उत्तर हमें आसानी से नहीं मिल पाता है..........

Friday, October 1, 2010

मुझे छोड़ क्यों जाते हो ?

साथ दिया इतने तक तुमने,
अब दूर क्यों जाते हो,
सफ़र कट चुका लगभग अब तो,
मुझे छोड़ क्यों जाते हो ?

हाथ पकड़ा था मेरा जब
मैं अनजान अकेला था,
सब कुछ अब जब जान गया मैं,
मुझे छोड़ क्यों जाते हो ?

हँसता मैं, संग हँसते थे,
रोते पल में तुम थमते थे,
अब तुम यूँ चुप-चुप से रहकर
मुझे छोड़ क्यों जाते हो ?

कितनी ही भटकी राहों में
साथ तुम चले मेरे थे,
सीधी-सीधी राहों में अब
मुझे छोड़ क्यों जाते हो ?

तुम मुझसे कुछ दूर-दूर हो,
कमी तुम्हारी खलती है,
साथ तुम्हारा जब मैं चाहूँ,
मुझे छोड़ क्यों जाते हो ?


कोई भूल हुई हो मुझसे ,
तो उसको तुम माफ़ करो,
कुछ कहने को दिए बिना यूँ,
मुझे छोड़ क्यों जाते हो ?

तुम्हें अपनों में देखा है,
वह छवि मिटा क्यों जाते हो ?
तुम मेरे इतने प्यारे हो,
मुझे छोड़ क्यों जाते हो ?